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Manu Vashistha तुमचे अपडेट्स पोस्ट झाले हिंदी ब्लॉग
1 आठवडा पूर्वी

✍️वाकई आप बच्चों की जिम्मेदार और मजबूत बनाना चाहते हैं तो उन्हें जिम्मेदारी, नए नए अनुभव करने का मौका दीजिए। फिर भले ही आप के कुछ पैसों का नुकसान भी हो जाए तो कोई बात नहीं, सीखेंगे कैसे? जन्म से तो कोई भी होशियार नहीं होता, इसलिए थोड़े नुकसान से अगर बच्चे मजबूत बने, तो ऐसा होना अच्छा है।

अजून वाचा
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3 आठवडा पूर्वी

हो सकता है,
दूसरी ओर की घास
अधिक हरी लगे
लेकिन अगर आप अपनी
घास को पानी देने का
समय निकालें तो यह
भी उतनी ही हरी लगेगी
___अज्ञात

अजून वाचा
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4 आठवडा पूर्वी

खुद पर कर यकीं,ख्वाब सारे सच होंगे।समय का क्या!
आज उन्नीस,कल बीस, तो कभी इक्कीस भी होंगे।
नव वर्ष 2020 मंगलमय हो💐🙏
वाशिष्ठ परिवार

अजून वाचा
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1 महिना पूर्वी

✍️अंतरराष्ट्रीय #चायदिवस 🍮 की शुरुआत 15 दिसंबर 2005 को नई दिल्ली से हुई। इसके बाद यह पूरे #विश्व में फैला। सुबह की चाय और मां के बगैर उठना थोड़ा अधूरा सा लगता है, धीरे धीरे आदत बनती है। चाय भी कई तरह से बनती है, ग्रीन टी तो स्वास्थ्य की दृष्टि से, आजकल बहुत पसंद की जाती है, लेकिन चाय के #शौकीन कहें या चाय के नशेड़ी उन्हें तो (लौंग अदरक की) चाय मतलब चाय वो भी #कुल्हड़ में मिल जाए तो कहना ही क्या। लगता है ब्रह्माण्ड में सिर्फ चाय ही परम आनंद की प्राप्ति करा सकती है। गुड़, अदरक वाली चाय, आहा! so yammiii जुकाम भी कोसों दूर। चाय पीने के भी अपने फायदे और नुकसान हैं। यह अनेक प्रकार से बनाई एवं पी जाती है। अगर सुबह की चाय अच्छी नहीं मिली, तो लगता है, पूरा दिन की शुरुआत ही सही नहीं है। शुरू शुरू में तो हम बच्चों को बहुत डांट पड़ती थी चाय पीने पर, कभी छुप कर तो कभी दादी से मनुहार कर या फिर सर्दी, खांसी जुकाम, बुखार में ही नसीब होती थी चाय। लेकिन अब तो आम हो चुकी है, इसे पारम्परिक, सर्व सुलभ पेय पदार्थ की श्रेणी में रखें, तो ज्यादा बेहतर होगा। सही भी है, चाय की निगाह में (ईश्वर की तरह सम दृष्टि, समभाव) सब बराबर क्या अमीर क्या गरीब। पुणे में चाय की एक अलग ही स्टाइल देखने को मिली, कुल्हड़ को गर्म तपा कर फिर उसमें चाय पीने का अपना अलग आनंद। चाय की सब अपनी अपनी ब्रांड, जगह के शौकीन होते हैं, जब खास आत्मीयता दिखानी हो या कोई विशेष बात करनी हो तो कहेंगे, मिलते हैं फलां चाय वाले प्वाइंट पर। कुछ तो खास बात है, इस मरजानी चाय में, कोई यूं ही मुरीद नहीं होता किसी का। चाय की थड़ी पर युवा हों या बूढ़े, दोस्त हों या सखी, या जिनको घर पर चाय पीने पर रोक है, गपशप करते दिख ही जाते हैं। चाय पर चर्चा तो आम बात है, कम खर्च में बात बन जाए, इससे अच्छा क्या हो सकता है।
#चाय बिगड़ी तो सवेरा बिगड़ा
#सब्जी बिगड़ी तो बिगड़ा दिन सारा
#अचार बिगड़े तो पूरा साल बिगड़ा 
#पत्नी बिगड़ी तो गृहस्थ आश्रम बेकारा
#बच्चे बिगड़े तो बुढ़ापा सारा बिगड़ा 
#समझ बिगड़ी तो सब कुछ बिगड़ा,
रहा ना कुछ पास तुम्हारा।।

अजून वाचा
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1 महिना पूर्वी

✍️अभिव्यक्ति की कमी और मानसिक रोग__
सही मायने में, आजकल समाज में अभिव्यक्ति के लिए स्थान ही नहीं है, इसलिए शायद मानसिक बीमारियों के ग्राफ में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। मानसिक बीमारियों का मुख्य कारण है, अभिव्यक्ति की कमी। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर दिखावा या #उद्दंडता है, वह भी सही बात नहीं है। अभिव्यक्ति, बच्चों जैसी निश्छल होनी चाहिए। दुनिया में ज्यादातर लोगों को अपनी भावनाएं प्रदर्शित करने का मौका ही नहीं मिलता। उन्हें प्यार, दुख, खुशी से भी डर लगता है। जोर से हंसना नहीं, मन करे तो बेचारे रो भी नहीं सकते, सभ्यता के #विरुद्ध जो है। रोना भी एक समस्या जैसा ही है, बच्चा भी अगर जोर से रोए तो डांट कर चुप करा दिया जाता है, घर में कुछ भी परेशानी हो जाए तो गुपचुप गुपचुप शांत करा दिया जाता है, लोगों से छुपाया जाता है, और इस तरह एक घुटन सी हो जाती है। पति पत्नी को भी अपनी भावनाएं व्यक्त करने में, अच्छा खासा समय गुजर जाता है, फिर भी अपनी मन की बात कहने में संकोच करते हैं। यह बड़ी दुविधा है, अगर कोई बेटी ससुराल में सामंजस्य नहीं कर पाती है, तो उसके मायके वाले भी उसको बात कहने से रोकते हैं, और इस तरह वह अंदर ही अंदर घुट कर मानसिक रोगों की शिकार हो सकती है। दुख हो या सुख शेयर करने में क्या जाता है, अभिव्यक्ति से जहां सुख बढ़ता है, वहीं दुख घटता है इसलिए अभिव्यक्त तो करना ही चाहिए। आजकल जो इतनी आत्महत्याओं की घटनाएं बढ़ रही हैं, उसमें भी कहीं ना कहीं भावनाओं की शेयरिंग का अभाव कह सकते हैं, यह सब आधुनिक संस्कृति की देन है। अगर आपकी भावनाओं को पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं मिलती है, तो यह अंदर जाकर आपका बहुत नुकसान कर सकती हैं। अभिव्यक्ति की आजादी, एक बहस का विषय बना हुआ है, जिसको सब अपने मनमाने ढंग से प्रयोग करना चाहते हैं।अभिव्यक्ति का अर्थ किसी को भी हर्ट करना नहीं, दूसरों की भावनाओं की भी कद्र करनी होगी। अश्लीलता को अभिव्यक्ति की आजादी तो नहीं कह सकते हैं ना! कोई अभिव्यक्ति के नाम पर स्वछंद हो दूसरों को गाली दे, तो कोई देश विरोधी आंदोलन छेड़ संतुष्टि चाहता है। इसका दुरुपयोग अधिक हो गया है। लेकिन फिर भी मर्यादाओं का सम्मान करते हुए, अभिव्यक्ति अवश्य करना चाहिए।

अजून वाचा
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2 महिना पूर्वी

✍️कविता_बेटियां
ओस की बूंदें और बेटियां,
एक तरह से एक जैसी होती हैं।
जरा सी धूप, दुख से ही मुरझा जाती हैं।
लेकिन दे जाती हैं जीवन,
बाग बगीचा हो या रिश्तों की बगिया।
ओस और बेटियां होती हैं,
कुछ ही समय की मेहमान।
धूप के आते ही छुप जाती है ओस,
और,
समय के साथ बेटियां भी बन जाती हैं,
किसी की पत्नी, बहू, भाभी और मां।
जिसमें गुम हो जाती है बेटी की मासूमियत,
फिर भी दे जाती हैं ठंडक,
सीमित समय में भी, ओस की ही तरह।
ओस बरसती है खुली छत, खुले खेत में,
तो बेटियां महकती हैं,
देती हैं दुआएं, वरदान,
घर आंगन में तुलसी की तरह।

अजून वाचा
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2 महिना पूर्वी

देश के युवा! सात समुंदर पार
बड़ी कंपनी के दीवाने हो गए
इस देश में जन्म लेकर
अपने देश से बेगाने हो गए
पिंजरा सोने का उनको
रास आया इस कदर
बेचकर स्वाभिमान
वह पराए देश के वासी हो गए
MV

अजून वाचा
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2 महिना पूर्वी
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3 महिना पूर्वी

कौन कहता है,कि दूरियां हमेशा
किलोमीटरों में नापी जाती है।
कभी कभी ख़ुद से मिलने में भी
जिन्दगी गुजर जाती है।।

अजून वाचा
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3 महिना पूर्वी

जिन्हें सिगरेट,शराब,जंक फूड में सेहत की चिंता नहीं हैं..उन्हें भी दिल्ली में प्रदूषण की चिंता सता रही है,मास्क लगाए घूम रहे हैं????

अजून वाचा