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Do You Know that it is one's own ego that makes one see fault in others? Anyone who sees only his own faults will always see others as faultless.
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...." સ્તર ભણતરનું "
બસ, ભારણ જ વધતું જાય છે દફતરનું.
રોજેરોજ સ્તર ઘટતું જાય છે ભણતરનું.
ગોખણપટ્ટી કરાવાથી ન આગળ વધાય,
એ મહત્ત્વ જ ભૂલાતું જાય છે ગણતરનું.
જો પાયો જ રાખી દઈએ જ્યાં કમજોર,
તો મજબૂતપણું ઢળતું જાય છે ચણતરનું.
શિક્ષણ પણ થતું ગયું એક વેપાર આજ,
ખરું મૂલ્ય જ વિસરાતું જાય છે ઘડતરનું.
મૂલ્યાંકન થતું રહે જ્યાં ગુણાંકથી "વ્યોમ"
ત્યાં એક પુષ્પ મૂરઝાતું જાય છે જીવતરનું.
✍... વિનોદ. મો. સોલંકી "વ્યોમ"
જેટકો (જીઈબી), મુ. રાપર.
मरा नहीं हूँ, और जिंदा भी नहीं हूँ…
मैं वो ख्वाब हूँ जो खुली आँखों में कैद है,
एक आवाज़ हूँ जो किसी के कानों तक नहीं पहुंचती।
मैं धड़कन हूँ, मगर एहसास से खाली,
एक लम्हा जो वक़्त के दरमियान अटका है।
मैं साया हूँ, मगर रोशनी से दूर,
एक रास्ता हूँ, मगर मंज़िल से महरूम।
मैं सांस लेता हूँ, पर जिंदा होने का अहसास नहीं,
शरीर हूँ, मगर रूह से जैसे जुदा हूँ।
शायद मैं एक अधूरी दास्तान हूँ,
जिसका न कोई आग़ाज़ है, न कोई अंजाम।
या फिर मैं वो सवाल हूँ,
जिसका जवाब किसी के पास नहीं…
#विश्व_रंगमंच_दिवस
ये जिंदगी का रंगमंच और शतरंज़ की बिसात है।
कहीं सहरा, कहीं दरिया, ये क़ुदरत के अंदाज है।
परिंदों और जानवर से ज़ुदा तेरी इक पहचान है,
निभा क़िरदार शिद्दत से, न भूल कि तू इंसान है।
. . . विश्व रंगमंच दिवस (World Theatre Day) हर वर्ष 27 मार्च को मनाया जाता है। वर्ष 1961 में इंटरनेशनल थिएटर इंस्टिट्यूट ने इस दिन की स्थापना की थी। ऐसा माना जाता है कि पहला नाटक पांचवी शताब्दी के प्रारंम्भिक दौर में एथेंस में एक्रोप्लिस में स्थित थिएटर ऑफ़ डायोनिसस में आयोजित हुआ था। और उसके बाद ही थिएटर पूरे ग्रीस में तेज़ी से चर्चित हुआ।
विश्व रंगमंच दिवस मनाने का उद्देश्य लोगों में
थिएटर को लेकर जागरुकता लाना और थिएटर की अहमियत याद दिलाना है।
हालांकि भारत में बदलते समय के साथ रंगमंच का चलन कम हो गया है, लेकिन फिर भी 'मल्टीप्लेक्स' के बावजूद, आज भी नाट्य अकादमी, कॉलेज, यूनिवर्सिटीज और नुक्कड़ नाटक के जरिए, रंगमंच काफी प्रचलन में है।
. . . वीर।
🟢कैरी 🧅कांदा चटणी
🟢 साहित्य
एक मध्यम कैरी
एक मध्यम कांदा
साखर दोन चमचे
एक मिरची बारीक चिरून
एक चमचा तिखट
मीठ चवीनुसर
अर्धा चमचा जिरे
मोहरी आणि हिंगाची फोडणी
🟢कृती
कैरी साल काढून किसून घ्यावी
कांदा कीसून घ्यावा
कैरी कांदा कीस,थोडे जिरे साखर, मीठ हे सर्व एकत्रित करून घ्यावे
मोहरी हिंग फोडणी करुन त्यात एक चमचा तिखट घालावे
व लगेच ती फोडणी कीसावर ओतावी
परत हे सगळे मिश्रण हलवुन घ्यावें
🟢बारीक मिरची व तिखट दोन्हींमुळे एक वेगळा स्वाद या चटणीला येतो
अधूरी मोहब्बत: राजू और पूजा की प्रेम कहानी
प्रेम की अनकही शुरुआत
मधुबनी जिले के खजौली ब्लॉक के कन्हौली बैरबन्ना गाँव का रहने वाला राजू एक साधारण लेकिन भावुक लड़का था। वह अपने गाँव का सीधा-सादा युवक था, जिसे पढ़ाई में उतना मन नहीं लगता था, जितना कि पूजा की एक झलक पाने में। पूजा चतरा गाँव की रहने वाली थी, और दोनों गाँव पास-पास ही थे।
राजू के लिए पूजा सिर्फ एक लड़की नहीं, बल्कि उसके जीवन की सबसे खूबसूरत हकीकत थी। वह अक्सर सुबह 5 बजे बैरबन्ना पुल पर खड़ा रहता, बस पूजा को देखने के लिए। पूजा हर सुबह खजौली कोचिंग के लिए निकलती थी, और राजू का दिन तब तक शुरू नहीं होता जब तक वह उसे देख नहीं लेता।
वो कभी पूजा से बात नहीं करता था, बस दूर से देखता रहता। कई बार उसकी आँखों में एक सवाल उभरता, "क्या वह कभी मुझे भी देखेगी?" लेकिन पूजा अपने ही ख्यालों में मग्न रहती। राजू हर रोज़ ठानता कि आज वह उससे बात करेगा, लेकिन जब पूजा पास आती, उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगता और शब्द गले में अटक जाते।
दिल की बात दिल में ही रह गई
वक़्त बीतता गया, दिन, हफ्ते, और फिर साल गुजर गए, लेकिन राजू की हिम्मत नहीं जुटी। वह हर रोज़ बस एक झलक देखकर खुश हो जाता।
फिर एक दिन अचानक राजू को पता चला कि खजौली में पढ़ने वाले एक लड़के ओम ने पूजा को प्रपोज कर दिया। ओम सीधा-सपाट लड़का था, उसने बिना हिचक पूजा के सामने अपने दिल की बात रख दी। पूजा ने कुछ देर सोचा, मुस्कुराई, और फिर ओम का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।
जब यह बात राजू को पता चली, तो उसका दिल टूट गया। वह ठगा-सा महसूस कर रहा था। उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया। जिसे वह इतनी शिद्दत से चाहता था, वह अब किसी और की हो चुकी थी।
राजू ने खुद को कोसा, "काश मैंने पहले कह दिया होता! काश मैं डरता नहीं!" लेकिन अब पछताने के अलावा कुछ नहीं बचा था।
खामोश मोहब्बत का दर्द
अब भी जब पूजा कोचिंग जाती, राजू उसी पुल पर खड़ा होता। लेकिन अब उसकी आँखों में पहले जैसी चमक नहीं थी। अब वह पूजा को देखकर मुस्कुराता नहीं था, बल्कि मन ही मन रोता था।
एक दिन उसका दोस्त रमेश बोला, "राजू, तूने कभी हिम्मत ही नहीं की, तो उसे कैसे पता चलता कि तू उसे चाहता है?"
राजू के पास कोई जवाब नहीं था। मोहब्बत सिर्फ महसूस करने से पूरी नहीं होती, उसे कहने की भी हिम्मत चाहिए। लेकिन राजू में वो हिम्मत कभी नहीं आई।
पूजा अब खुश थी, और राजू सिर्फ सोचता रह गया कि "क्या होता अगर मैं अपनी मोहब्बत का इज़हार कर देता?" शायद कहानी कुछ और होती। लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।
अधूरी कहानी, अधूरी मोहब्बत
समय बीतता गया, लेकिन राजू की मोहब्बत वहीं ठहर गई, उसी पुल पर, उसी सुबह के 5 बजे। वह अब भी रोज़ वहाँ जाता, लेकिन पूजा के लिए नहीं, बल्कि उन यादों के लिए जो अब भी उसके दिल में बसी थीं।
कुछ प्रेम कहानियाँ कभी पूरी नहीं होतीं, क्योंकि प्यार के साथ-साथ हिम्मत भी ज़रूरी होती है... और राजू वही हिम्मत नहीं कर पाया।
**સાંજ ધળતી હતી, પંખીઓ ઘેર વળતા હતા,**
કોઈ સાથે, કોઈ એકલું, સ્મિત સાથે વળતા હતા।
દિવસભરનું બોજું, હવે મગજમાં ધૂમતું હતું,
મનનો થાક ન ઝુંકાતો, પણ શરીર બધું તૂટતું હતું।
કામના ઘસારા વચ્ચે, જીવનના સપના ખોવાયા,
મજુરની ઈચ્છાઓ માનવીય જરૂરિયાતે ઢંકાયા।
ઘરે દીકરીની હંસી હતી, પત્નીનો મધુર સ્વર,
પણ અંદર ક્યાંક બન્ને આંખોમાં હતો દર્દનો અખડવર।
હાસ્ય પણ ઝૂઠું લાગે, હૈયામાં છે બળતી આગ,
વિશ્રામમાં પણ વસે છે દુઃખના વણમાટેના રાગ।
આશાઓ છે, પણ સમય સાંભળે નહીં,
મનના ઉથલ-પાથલને કોઈ ઓળખે નહીં।
માત્ર કાગળે ખૂણું છે, જ્યાં પ્રેમ વહેતો રહે,
આ બોળી દુનિયામાં તે જ મારી એક સાથ રહે।
"હું થાકે છૂપાવો છું, છીપી રહ્યો છું દુઃખ,
એમ જતો છીહું ઘર, જ્યાં પ્રેમે આપ્યો છે સુખ।"
સાંજ ધળતી હતી, પંખીઓ ઘેર વળતા હતા,
અને હું મારા લાગણીઓ કાગળ પર છાંટતો હતો।
તારાઓની ઝળહળીઓમાં મારા સપનાઓ છે છુપાયેલા,
છતાં, જીવનના શ્વાસ કવિતામાં છે ધબકાતા જીવાતા
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