shiromani mathur लिखित कथा

राहें - 28

by shiromani mathur
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गवाहीमैं सुबह से ही व्यस्त थी । घर के सारे काम मुझे ही निपटाने थे। क्योंकि पुत्रवधु कुछ दिनों ...

राहें - 27

by shiromani mathur
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मंगलसूत्रशंशाक की शादी का कार्ड मिलते ही सोनम खुशी से नाचउठी। उसकी सखी कुसूम के बेटे शंशाक के लिये ...

राहें - 26

by shiromani mathur
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कर्जरमन आज फिर खाली हाथ घर आकर बैठ गये-पत्नी शीला ने पूछा- कंगन लाये?रमन ने कहा आज भी उसने ...

राहें - 25

by shiromani mathur
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बूढ़ी माँउमा अपनी माँ पुष्पा से मिलने मायके आयी थी। लम्बा सफरतय करके उमा व उसका बेटा यहाँ आये ...

राहें - 24

by shiromani mathur
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नींव के पत्थरहमारे आसपास कुछ ऐसे व्यक्ति होते हैं, जो अपने अच्छेस्वभाव, संस्कारों से निरन्तर समाज सेवा करते रहते ...

राहें - 23

by shiromani mathur
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पश्चातापमनीषा मंदिर जाते समय अपने पुत्र देवेश को बोली- "मैं मंदिरजा रही हूँ तुम अपने ऑपरेशन के लिये हॉस्पीटल ...

राहें - 22

by shiromani mathur
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अपनी अपनी सोचतेजू को आता देखकर सेठ धरमचंद बोले - आज तुम फिर लेटहो गये। बहुत ग्राहक बैठे हैं ...

राहें - 21

by shiromani mathur
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अभी-परीक्षा शेष हैमैं बरामदें में बैठी मोबाइल देख रही थी। दरवाजे पर आहट नेमेरा ध्यान खींचा ,गेट तक दुष्टि ...

राहें - 20

by shiromani mathur
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अहंकारहवा के तेज झोंके उसकी साडी के आंचल और बालों को बिखेररहे थे, बार बार वह साड़ी का आंचल ...

राहें - 19

by shiromani mathur
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परमार्थडा. सिंह साहब के घर कोहराम मचा हुआ था। उनका मंझलाबेटा गगन सुबह-सुबह चल बसा था। सिंह साहब की ...