vikram kori लिखित कथा

समर्पण से आंगे - 7

by vikram kori

‎‎भाग – 7‎जब बदनामी ने दरवाज़ा खटखटाया‎समाज जब हारने लगता है,‎तो वह सच से नहीं,‎बदनामी से हमला करता है।‎‎अगली ...

समर्पण से आंगे - 6

by vikram kori
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‎‎भाग – 6‎‎‎सुबह की धूप आँगन में उतर रही थी,‎लेकिन घर के अंदर एक अजीब सा सन्नाटा छाया हुआ ...

समर्पण से आंगे - 5

by vikram kori
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‎भाग – 5‎‎‎माँ के फैसले के बाद सब कुछ बाहर से सामान्य दिख रहा था,‎लेकिन अंदर ही अंदर हर ...

समर्पण से आंगे - 4

by vikram kori
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‎‎भाग – 4‎‎गाँव की बस सुबह-सुबह शहर पहुँची।‎‎अंकित प्लेटफॉर्म पर खड़ा था, दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।‎उसे पता ...

समर्पण से आंगे - 3

by vikram kori
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‎भाग -3‎बारिश के बाद की सुबह कुछ ज़्यादा ही खामोश थी।‎‎मंदिर के सामने वही जगह, वही फूलों की खुशबू—‎लेकिन ...

‎समर्पण से आंगे - 2

by vikram kori
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‎‎ भाग – 2‎‎उस रात अंकित देर तक सो नहीं पाया।‎‎कमरे की बत्ती बंद थी, लेकिन दिमाग़ में सवालों ...

‎समर्पण से आंगे - 1

by vikram kori
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‎part - 1‎‎सुबह के छह बज रहे थे।‎शहर अभी पूरी तरह जागा नहीं था, लेकिन अंकित की ज़िंदगी में ...

जहाँ से खुद को पाया - 4 (लास्ट पार्ट)

by vikram kori
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Part - 4 लास्ट पार्टसुबह की हवा में हल्की ठंडक थी, लेकिन सयुग के भीतर अजीब सी तपिश थी।‎रात ...

जहाँ से खुद को पाया - 3

by vikram kori
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‎part - 3‎‎दिल्ली की रातें अब सयुग को डराती नहीं थीं। ‎पहले जिन सड़कों पर चलते हुए उसे अपने ...

जहाँ से खुद को पाया - 2

by vikram kori
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PART–2‎‎‎‎दिल्ली की सुबह गाँव की सुबह जैसी नहीं होती। यहाँ सूरज निकलने से पहले ही शोर शुरू हो जाता ...