Dr Yogendra Kumar Pandey लिखित कथा

प्रेम का छतनार वृक्ष - 1

by Yogendrakumar Pandey

कविता: (1) प्रेम का छतनार वृक्षप्रेम का निःशब्द बीजबोया जाता है अंतस्तल में,ताकि अंकुरित हो सके,प्रेम का पौधाऔर शाखाएं ...

यशस्विनी - 43

by Yogendrakumar Pandey
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भोग से भी बड़ा आनंद:- रोहित ने उस बांसुरी को श्रद्धा पूर्वक अपने मस्तक से लगाया और ...

यशस्विनी - 42

by Yogendrakumar Pandey
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एक और ब्रह्मास्त्र:-नेहा और प्रज्ञा भी अभी आश्रम में ही रुके हुए हैं।रोहित के जीवन से यशस्विनी के जाने ...

यशस्विनी - 41

by Yogendrakumar Pandey
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छठी इंद्री रोहित जैसे नींद से जाग उठे हों,आश्चर्य से सभी को देखने लगे। स्वामी मुक्तानंद ...

यशस्विनी - 40

by Yogendrakumar Pandey
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द फोर्थ जेंडर:-चौंकते हुए स्वामी अक्षयानंद ने कहा,"यह अटपटा तो नहीं हो जाएगा और इससे कई गहरे प्रश्न खड़े ...

यशस्विनी - 39

by Yogendrakumar Pandey
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आधा तू आधा मैं:-इसके बाद के दिनों में नेहा से व्यवहार में भी रोहित सहज होते गया और इधर ...

यशस्विनी - 38

by Yogendrakumar Pandey
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दूषित मन की ग्लानिजब स्वामी मुक्तानंद स्वयं ध्यान में डूबे रहते थे तो स्वामी अक्षयानंद रोहित से योग का ...

यशस्विनी - 37

by Yogendrakumar Pandey
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मिलन की उत्कंठा: -"विराट कर्तव्य और गृहस्थ धर्म दोनों एक साथ भी तो निभाए जा सकते हैं .. ।महेश ...

यशस्विनी - 36

by Yogendrakumar Pandey
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देह का आकर्षणप्रज्ञा ने विवेक की बातें फोन पर सुन ली थीं।प्रज्ञा और विवेक दोनों ही आश्रम के लिए ...

यशस्विनी - 35

by Yogendrakumar Pandey
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प्रज्ञा ने विवेक की बातें फोन पर सुन ली थीं।प्रज्ञा और विवेक दोनों ही आश्रम के लिए नए हैं।प्रज्ञा ...