जब रिश्ता प्यार बन जाए. - 15 Priyam Gupta द्वारा प्रेम कथा मराठी में पीडीएफ

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जब रिश्ता प्यार बन जाए. - 15



Episode 15 – जब बात दिल से घर तक पहुँचे 





कुछ रिश्ते
तय नहीं किए जाते,
वे धीरे-धीरे
अपनी जगह बना लेते हैं।
बिल्कुल वैसे
जैसे घर में
किसी पुराने फ़र्नीचर के बीच
एक नई चीज़ रख दी जाए—
शुरू में अजनबी,
फिर ज़रूरी।
Episode 14 के बाद
Priyam के भीतर
कुछ बदल गया था।
अब वह हर छोटी बात पर
अपने मन को टटोलती नहीं थी।
अब उसे बार-बार
ये साबित करने की ज़रूरत नहीं लगती थी
कि वह सही कर रही है
या नहीं।
वह बस
अपने भीतर के संतुलन को
महसूस कर रही थी।
सुबह उठते ही
उसने खिड़की खोली।
हवा हल्की थी,
धूप धीमी।
उसे लगा जैसे
ज़िंदगी भी
उसी रफ्तार से
चल रही है
जिसकी उसे ज़रूरत थी।
रसोई से
बर्तनों की आवाज़ आ रही थी।
माँ कुछ बना रही थीं।
आज उनका काम
थोड़ा ज़्यादा सलीके से हो रहा था—
सब्ज़ियाँ बराबर कट रही थीं,
डिब्बे अपनी जगह पर रखे जा रहे थे।
Priyam ने ये महसूस किया।
“आज कुछ खास है क्या?”
उसने casually पूछा,
जैसे सच में
कुछ खास न हो।
माँ ने पलटकर नहीं देखा।
“नहीं,”
उन्होंने कहा।
“बस यूँ ही।”
लेकिन Priyam जानती थी—
माँ के “यूँ ही”
कभी खाली नहीं होते।
दोपहर तक
घर में एक अजीब-सी तैयारी थी।
कोई सीधे कुछ कह नहीं रहा था,
पर सब
कुछ सोच रहे थे।
दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई।
पापा आ गए थे।
उनके चेहरे पर
थकान नहीं थी,
बस एक गंभीर शांति थी।
वही शांति
जो किसी अहम बात से पहले
मन में उतरती है।
उन्होंने कपड़े बदले,
पानी पिया,
और फिर Priyam को आवाज़ दी।
“ज़रा यहाँ आओ।”
माँ भी आकर
उनके पास बैठ गईं।
कमरे में
ना तनाव था,
ना डर।
बस
एक ईमानदार बातचीत का वक़्त था।
“Priyam,”
पापा ने धीरे से कहा,
“हम तुमसे
कोई जल्दबाज़ी नहीं चाहते।”
ये सुनते ही
Priyam के कंधे
अपने आप ढीले पड़ गए।
उसे लगा जैसे
किसी ने
उसके भीतर जमा
दबाव को
थोड़ा कम कर दिया हो।
“हम बस ये जानना चाहते हैं,”
माँ ने कहा,
“कि तुम जो भी सोच रही हो,
उसमें तुम्हारा मन
पूरी तरह शामिल है या नहीं।”
Priyam ने नज़र नीचे कर ली।
कुछ पल
वह चुप रही।
उस चुप्पी में
डर नहीं था,
सोच थी।
फिर उसने सिर उठाया।
“मैं तैयार हो रही हूँ,”
उसने कहा।
“धीरे…
पर सच के साथ।”
पापा ने हल्के से
सिर हिलाया।
“यही हमारे लिए
सबसे ज़्यादा मायने रखता है।”
माँ ने उसका हाथ
अपने हाथ में ले लिया।
“तुम अकेली नहीं हो,”
उन्होंने कहा।
शाम को
Priyam अपने कमरे में थी।
फोन उठा
तो Yaman का मैसेज था।
आज घर में सब ठीक है?
उस एक लाइन में
जिज्ञासा भी थी
और सम्मान भी।
Priyam के होंठों पर
मुस्कान आ गई।
हाँ।
और आज पहली बार
मुझे लगा
कि चीज़ें
सही दिशा में हैं।
कुछ सेकंड बाद
उसका जवाब आया—
मुझे खुशी है
कि आप ऐसा महसूस कर रही हैं।
बस इतना।
कोई अगला सवाल नहीं,
कोई दबाव नहीं।
Priyam को यही बात
सबसे ज़्यादा सुकून देती थी।
अगले कुछ दिन
शांत बीते।
कभी छोटा सा कॉल,
कभी दो लाइन का मैसेज।
पर हर बार
एक एहसास था
कि सामने वाला
वहीं है।
ना आगे खींचने वाला,
ना पीछे हटने वाला।
बस साथ चलने वाला।
एक शाम
Yaman ने धीरे से कहा—
“मेरे माता-पिता
आपसे और आपके परिवार से
औपचारिक तौर पर
मिलना चाहते हैं।”
फिर उसने तुरंत जोड़ा—
“अगर आप तैयार हों तो।
अगर नहीं,
तो हम इंतज़ार करेंगे।”
Priyam ने फोन
कान से थोड़ा हटाया।
कमरे में देखा।
वही दीवारें,
वही किताबें,
वही ज़िंदगी।
पर अब
वह अलग महसूस कर रही थी।
उसने फोन वापस कान से लगाया।
“मैं तैयार हूँ,”
उसने कहा।
“डर के बिना नहीं…
पर भरोसे के साथ।”
उस पार
Yaman की आवाज़
थोड़ी गहरी हो गई।
“यही मेरे लिए
सबसे ज़्यादा मायने रखता है।”
रात को
Priyam देर तक
जागती रही।
लेकिन ये बेचैनी नहीं थी।
ये उस बदलाव की हलचल थी
जो किसी नए अध्याय से पहले
होती है।
उसने डायरी खोली
और लिखा—
पहली बार
मैं किसी मोड़ पर
रुककर नहीं डर रही।
मैं देख रही हूँ,
समझ रही हूँ,
और फिर आगे बढ़ रही हूँ।
उसी रात
Yaman ने
लाइट बंद करने से पहले
खुद से कहा—
इस बार
मैं किसी को जीतने नहीं जा रहा।
मैं किसी के साथ
चलने जा रहा हूँ।