मूक वेदना की पुकार उषा जरवाल द्वारा कथा मराठी में पीडीएफ

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मूक वेदना की पुकार

ईश्वर की इस सृष्टि में मनुष्य को केवल बुद्धि और वाणी ही नहीं मिली, उसे एक और अमूल्य उपहार मिला है - संवेदना। यही संवेदना मनुष्य को अन्य प्राणियों से अलग बनाती है। किंतु विडंबना यह है कि वही मनुष्य कभी-कभी उन आँखों की भाषा पढ़ना भूल जाता है, जिनमें शब्द नहीं होते, पर जीवन की असह्य पीड़ा ठहरी होती है।

मैं यहाँ यह स्पष्ट कर देना चाहती हूँ कि मैं मांस खाने वालों के विरुद्ध नहीं हूँ, न ही किसी धर्म या परंपरा का विरोध करती हूँ। प्रत्येक व्यक्ति को अपने विश्वासों के साथ जीने का अधिकार है और मैं सभी धर्मों का सम्मान करती हूँ। यह केवल मेरे मन में उठी करुणा की एक विनम्र अभिव्यक्ति है।

कभी किसी कसाई की दुकान के सामने कुछ क्षण ठहरकर देखिए। वहाँ एक मुरगा कोने में सहमा हुआ खड़ा रहता है। उसकी लाल कलगी जैसे भय से फीकी पड़ गई हो। उसकी आँखें बार-बार उस व्यक्ति की ओर उठती हैं, जो उसे खरीदने आया है—जैसे वह उन आँखों में एक क्षण के लिए दया खोज रहा हो। उसके पंख हैं, उड़ान उसकी प्रकृति है, पर उस क्षण वह मानो अपनी उड़ान ही भूल गया है। जब कसाई अपने हाथ में चमकता हुआ छुरा उठाता है और उसकी गर्दन की ओर बढ़ता है, तब पास खड़े दूसरे मुर्गे एकदम स्थिर हो जाते हैं। वे चुप हैं, पर उनकी आँखों में ऐसा भय तैरता है मानो हवा तक काँप उठी हो।

कभी किसी बकरे को देखिए, जिसे वध के लिए ले जाया जा रहा हो। वह अपने मालिक के पीछे-पीछे चलता है, जैसे हर दिन चलता आया था—विश्वास के साथ। उसके गले में बँधी रस्सी उसके शरीर को ही नहीं, उसके निष्कपट विश्वास को भी बाँध लेती है। वह कभी-कभी ठिठक कर मालिक की ओर देखता है—मानो पूछना चाहता हो, “क्या आज भी तुम मुझे उसी तरह सहलाओगे?” पर आज उसके कदम जिस दिशा में बढ़ रहे हैं, वहाँ से कोई लौटकर नहीं आता। उसकी आँखों में एक ऐसी निरुपाय शांति उतर आती है, जो हृदय को भीतर तक चीर देती है।

कभी मछली को देखिए, जब वह पानी से बाहर छटपटाती है। जल ही उसका संसार था—वही उसका आकाश, वही उसकी साँस। पर जाल से बाहर आते ही उसका छोटा-सा शरीर तड़प उठता है। उसके पंख हवा में ऐसे फड़फड़ाते हैं जैसे वह अपने खोए हुए घर को पुकार रही हो। उस क्षण उसका प्रत्येक कंपन जीवन की अंतिम याचना बन जाता है।

और जब किसी गाय या बछड़े को वधशाला की ओर ले जाया जाता है, तब उसकी आँखों में एक गहरा प्रश्न तैरता है। वह बार-बार पीछे मुड़कर देखता है—मानो उस हरी घास, उस खुले आकाश और उस शांत जीवन को अंतिम बार अपने भीतर सँजोकर रख लेना चाहता हो। उसकी आँखों में जो पीड़ा होती है, वह शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती; वह केवल महसूस की जा सकती है।

कभी-कभी मन स्वयं से पूछ उठता है—

“क्या केवल वाणी ही पीड़ा का प्रमाण होती है?
या निस्तब्ध आँखों में भी एक संसार रोता है?”

ये सभी जीव बोल नहीं सकते, अपने पक्ष में कोई तर्क नहीं दे सकते। वे केवल अपनी आँखों से विनती करते हैं। उनकी यह मूक वेदना मनुष्य के हृदय की संवेदनशीलता को पुकारती है।

मनुष्य होने का अर्थ केवल शक्ति और अधिकार का होना नहीं है; उसका वास्तविक अर्थ है दया, करुणा और सहानुभूति। यदि हम इन मूक प्राणियों के प्रति थोड़ा-सा भी संवेदनशील हो सकें, उनकी पीड़ा को समझ सकें, तो शायद यह संसार थोड़ा अधिक मानवीय, थोड़ा अधिक कोमल बन सके।

अंत में पुनः यही कहना चाहूँगी कि यह किसी के विरुद्ध लिखा गया विचार नहीं है। मैं मांस खाने वालों के खिलाफ नहीं हूँ और न ही किसी धर्म या परंपरा का विरोध करती हूँ। मैं सभी धर्मों का सम्मान करती हूँ। यह केवल मेरे मन की एक करुण पुकार है—कि कभी-कभी हम उन आँखों में भी झाँक लें, जिनमें शब्द नहीं होते, पर जीवन की सबसे गहरी वेदना छिपी होती है।

 

उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’